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खतरनाक नहीं, प्रकृति का ‘सफाईकर्मी’ है लकड़बग्घा, मिथकों को तोड़ती वन विहार की ‘सुंदरी’ की कहानी

खतरनाक नहीं, प्रकृति का ‘सफाईकर्मी’ है लकड़बग्घा, मिथकों को तोड़ती वन विहार की ‘सुंदरी’ की कहानी

भोपाल के राष्ट्रीय उद्यान वन विहार में रहने वाली मादा हायना ‘सुंदरी’ आज पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। उसके जीवन से जुड़ी कई बातें भले ही अज्ञात हों …और पढ़ें

Publish Date: Thu, 30 Apr 2026 04:01:28 PM (IST)Updated Date: Thu, 30 Apr 2026 04:03:54 PM (IST)

वन विहार के बाड़े में नजर आई मादा लकड़बग्घा। (नवदुनिया)

HighLights

  1. इंटरेस्टिंग है राष्ट्रीय उद्यान वन विहार में रहने वाली मादा हायना ‘सुंदरी’
  2. मिथकों से परे, हायना निभाता है पारिस्थितिकी संतुलन में अहम भूमिका
  3. लकड़बग्घा मजबूत जबड़ों वाला सक्षम जीव है, जो शिकार भी करता है

मोहम्मद अबरार खान, नवदुनिया, भोपाल। जंगल की खामोशी में जब रात उतरती है, तो एक अनजानी-सी आवाज गूंजती है, जिसे लोग अक्सर डरावनी समझ लेते हैं, लेकिन यही आवाज उस जीव की पहचान है, जो बिना किसी शोर के प्रकृति की सफाई में जुटा रहता है। यह है लकड़बग्घा, जिसे “हायना” भी कहते हैं। जंगल के इस अनसुने नायक के संरक्षण के लिए हर साल अंतरराष्ट्रीय हायना दिवस अप्रैल में मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य इस जीव के प्रति जागरूकता फैलाना है।

जीती-जागती मिसाल है ‘सुंदरी

इसका मकसद डर और मिथकों को तोड़ना और लोगों को यह समझाना है कि हायना भी पारिस्थितिकी तंत्र का अहम हिस्सा है। भोपाल के राष्ट्रीय उद्यान वन विहार में रहने वाली मादा हायना ‘सुंदरी’ इसकी जीती-जागती मिसाल है। वर्ष 2012 में रायसेन के बाड़ी-बरेली क्षेत्र से लाई गई ‘सुंदरी’ आज पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। उसके जीवन से जुड़ी कई बातें भले ही अज्ञात हों, लेकिन उसकी भूमिका बहुत स्पष्ट है वह प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में अहम योगदान देती है। भारत के जंगलों और घास के मैदानों में पाए जाने वाले लकड़बग्घे स्वभाव से बेहद शर्मीले और निशाचर होते हैं।

प्रकृति का सफाईकर्मी है लकड़बग्घा

इंसानों से दूर रहना इनकी प्रकृति है, लेकिन फिल्मों और कहानियों ने इन्हें खतरनाक और चालाक शिकारी के रूप में इस तरह पेश किया है कि इनकी छवि डरावनी और बुरे जानवर की बन गई है। जबकि सच इसके बिल्कुल उलट है। लकड़बग्घा प्रकृति का सफाईकर्मी है। यह मृत जीवों को खाकर वातावरण को साफ रखता है और बीमारियों के फैलाव को रोकता है। अगर ये न हों, तो जंगल में सड़ते शव संक्रमण फैला सकते हैं और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है।

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यह जीव कई मिथकों का शिकार है। कोई इसे केवल मुर्दाखोर मानता है, कोई इसे कायर कहता है, तो कोई इसकी आवाज को अपशगुन समझता है। जबकि सच्चाई यह है कि लकड़बग्घा मजबूत जबड़ों वाला सक्षम जीव है, जो जरूरत पड़ने पर शिकार भी करता है और अपनी आवाज से अपने समूह से संवाद करता है। वन विहार की ‘सुंदरी’ हमें यही सिखाती है कि हर जीव का अपना महत्व है। जंगल का संतुलन सिर्फ शेर और बाघ से नहीं, बल्कि ऐसे अनदेखे और अनसुने रक्षकों से भी बना रहता है।

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