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इंदौर की शहरी सीमा में 28 लाख के पार पहुंची जनसंख्या, पंद्रह साल में नौ लाख की बढ़ोतरी

इंदौर की शहरी सीमा में 28 लाख के पार पहुंची जनसंख्या, पंद्रह साल में नौ लाख की बढ़ोतरी

वर्ष 2011 की जनगणना में करीब 19 लाख थी। यानी बीते 15 वर्षों में शहर की आबादी में लगभग नौ लाख से अधिक की बढ़ोतरी हुई। …और पढ़ें

Publish Date: Tue, 26 May 2026 10:19:51 AM (IST)Updated Date: Tue, 26 May 2026 10:23:17 AM (IST)

शहर में चल रही है जनगणना। (एआई जनरेट)

HighLights

  1. नगर निगम सीमा में संभावित जनसंख्या 28 लाख के पार पहुंच गई है
  2. वर्ष 2011 की जनगणना में करीब 19 लाख थी
  3. बीते 15 वर्षों में शहर की आबादी में लगभग नौ लाख से अधिक की बढ़ोतरी हुई

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। जनगणना-2027 के पहले चरण में जारी मकान गणना ने इंदौर के तेज शहरी विस्तार की तस्वीर साफ कर दी है। नगर निगम सीमा में संभावित जनसंख्या 28 लाख के पार पहुंच गई है, जो वर्ष 2011 की जनगणना में करीब 19 लाख थी। यानी बीते 15 वर्षों में शहर की आबादी में लगभग नौ लाख से अधिक की बढ़ोतरी हुई। वहीं मकानों और निर्माणों की संख्या भी दोगुनी से ज्यादा हो गई है।

इंदौर नगर निगम सीमा में मकान गणना के लिए बनाए गए 3898 गणना ब्लाकों में से अब तक 3660 से अधिक ब्लाकों का काम पूरा हो चुका है। अब तक के आंकड़ों के अनुसार शहरी सीमा में 8.08 लाख निर्माण चिन्हित किए गए हैं, जबकि 2011 की जनगणना में यह संख्या 3.96 लाख थी।

विशेषज्ञों के अनुसार निर्माण और आबादी में तेजी से हुई बढ़ोतरी का बड़ा कारण वर्ष 2014 में नगर निगम सीमा में 29 गांवों का शामिल होना भी है। इसके बाद वार्डों की संख्या 69 से बढ़कर 85 हो गई। वहीं बीते 15 वर्षों में सुपर कारिडोर, खंडवा रोड, देवास नाका, उज्जैन रोड, बायपास, देवगुराडिया, राऊ, एयरपोर्ट रोड आदि क्षेत्रों में तेजी से विकास हुआ और कई कालोनियों विकसित हुई।

इसके कारण यहां पर नए आवास बने। वहीं बारह से भी रोजगार और अन्य कार्य से बढ़ी संख्या में लोग इस अवधि में इंदौर आकर बसें हैं। नगर निगम आयुक्त नरेंद्रनाथ पांडे का कहना है कि मकानों की गणना का कार्य करीब 96 प्रतिशत हो चुका है और 30 मई तक यह कार्य पूरा कर लिया जाएगा।

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NEET जैसी परीक्षा कराना कैसे बन गई सरकार के लिए चुनौती?<p> <p style="float: left;width:100%;text-align:center"> <img align="center" alt="NEET Paper Leak" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/12/full/1778576419-9009.jpg" style="border: 1px solid #DDD;margin-right: 0px;float: none;z-index: 0" title="" width="1200" /></p> समीरात्मज मिश्र</p> <p> NEET परीक्षा दोबारा कराने की घोषणा सरकार भले ही कर चुकी हो लेकिन इसके खिलाफ देश भर में छात्र और युवा प्रदर्शन कर रहे हैं। परीक्षा रद्द करने की वजह ये है कि प्रश्नपत्र लीक हो गए थे लेकिन संसदीय समिति के सामने परीक्षा कराने वाली एजेंसी एनटीए के जो बयान मीडिया में सामने आए हैं, उससे यह मामला और गरम हो गया है। समाचार एजेंसी एएनआई के हवाले से कई मीडिया संस्थानों ने लिखा है कि नीट पेपर लीक मामले में संसदीय समिति के सामने एनटीए के डीजी और चेयरमैन ने कहा है कि परीक्षा लीक नहीं हुई है।</p> <p>  </p> <p> एएनआई के मुताबिक, “NEET पेपर लीक विवाद को लेकर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए के महानिदेशक अभिषेक सिंह और एनटीए चेयरमैन प्रदीप कुमार जोशी 21 मई को संसद की समिति के सामने पेश हुए। सूत्रों के मुताबिक बैठक के दौरान NTA प्रमुख ने एजेंसी का बचाव करते हुए दावा किया कि पेपर NTA के सिस्टम से लीक नहीं हुए थे। जब संसदीय समिति ने अधिकारियों से सीधा सवाल किया कि इस लीक के लिए आखिर जिम्मेदार कौन हैं, तो NTA प्रमुख ने जवाब दिया कि वे इसका सटीक जवाब सीबीआई की जांच पूरी होने के बाद ही दे पाएंगे।”</p> <p>  </p> <p> एनटीए ही वह संस्था है, जो नीट और इस तरह की करीब 15 परीक्षाएं आयोजित करती है। नीट-यूजी 2026 पेपर लीक मामले की जानकारी लेने के लिए एनटीए के महानिदेशक और चेयरमैन को संसदीय समिति के सामने बुलाया गया था। नीट यूजी की परीक्षा इसी महीने तीन मई को हुई थी, लेकिन पेपर लीक होने के बाद 11 मई को परीक्षा रद्द कर दी गई। फिलहाल पेपर लीक मामले की जांच सीबीआई कर रही है। दोबारा परीक्षा 21 जून को होगी।</p> <p>  </p> <p> मामले की जांच कर रही सीबीआई ने अब तक महाराष्ट्र और राजस्थान से कम से कम नौ लोगों को गिरफ्तार भी किया है जिसमें कुछ कोचिंग संस्थानों के मालिक और शिक्षक भी शामिल हैं।</p> <p>  </p> <h3> राज्यों का विरोध</h3> <p> नीट परीक्षा में हुई धांधली के चलते कई राज्य अब इस परीक्षा पर सवाल भी खड़े कर रहे हैं, खासकर दक्षिण भारत के राज्य। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने तो बारहवीं की परीक्षा के अंकों के आधार पर ही प्रवेश का सुझाव दिया है, वहीं केरल के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने तो इसे खत्म करने की ही मांग कर डाली है। जहां तक बारहवीं के अंकों के आधार पर मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश की बात है तो जानकारों का कहना है कि अलग-अलग राज्यों और केंद्रीय बोर्डों के अंकों में असमानता और अलग पैटर्न के कारण यह तरीका बहुत व्यावहारिक नहीं होगा। ऐसी दिक्कतों को दूर करने के लिए ही प्रवेश परीक्षा की शुरुआत हुई।</p> <p>  </p> <p> इधर, नीट परीक्षा दोबारा कराने की घोषणा करने के साथ ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा था कि अगले साल से यह परीक्षा ऑनलाइन कराई जाएगी जिसमें परीक्षा का मोड सीबीटी यानी कंप्यूटर बेस्ड टेस्टिंग होगा। लेकिन सवाल ये हैं कि क्या ऑनलाइन तरीका अपना कर ही परीक्षा पारदर्शी हो सकती है क्योंकि अभी भी कई परीक्षाएं ऑनलाइन होती हैं लेकिन उनमें भी धांधली की शिकायतें आती रहती हैं।</p> <p>  </p> <h3> कब बनी एनटीए?</h3> <p> साल 2017 से पहले देश में मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई अखिल भारतीय स्तर पर प्रवेश परीक्षा आयोजित करता था जबकि अलग-अलग राज्यों के बोर्ड अपने मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए के लिए अलग प्रवेश परीक्षाएं कराते थे। कुछ विश्वविद्यालय भी अलग प्रवेश परीक्षा आयोजित करते थे।</p> <p>  </p> <p> लेकिन साल 2017 में उच्च शिक्षा के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षा व्यवस्था में सख्ती, मानकीकरण और विश्वसनीयता लाने के मकसद से अखिल भारतीय स्तर पर NEET यानी 'नेशनल एलिजिबिलिटी कम इंट्रेंस टेस्ट' की व्यस्था शुरू हुई और इसे कराने की जिम्मेदारी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए को दी गई। यह एजेंसी 15 से अधिक परीक्षाएं आयोजित कराती है।</p> <p>  </p> <p> लेकिन बनने के बाद से ही एनटीए लगातार विवादों में घिरी रही है। अभी दो साल पहले भी यूजीसी-नेट परीक्षा को लेकर सवाल उठे थे और पेपर लीक के आरोप लगे थे। उस वक्त भी पूरी परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी। 2024 में भी नीट परीक्षा से पहले ही प्रश्न पत्र लीक होने की खबरें सामने आई थीं। बिहार और गुजरात के गोधरा समेत कई केंद्रों पर पेपर बेचे जाने और नकल कराने के पुख्ता सबूत मिले, जिसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई।</p> <p>  </p> <h3> कैसी मुश्किलें आ रही हैं?</h3> <p> जानकारों का कहना है कि 22-23 लाख छात्रों की परीक्षा एक साथ कराना आसान नहीं है लेकिन यदि परीक्षा कराई जा रही है तो जिम्मेदारी भी होनी चाहिए और जिम्मेदारी तय भी होनी चाहिए। दीपिका सिंघल दिल्ली की एक कोचिंग में नीट के छात्रों का मार्गदर्शन करती हैं और बॉटनी पढ़ाती हैं।</p> <p>  </p> <p> डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहती हैं, “इंजीनियरिंग की कई परीक्षाएं अब ऑनलाइन हो रही हैं। कई प्रतियोगी परीक्षाएं भी ऑनलाइन होती हैं। ऐसे में नीट भी ऑनलाइन हो तो कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन सवाल ये है कि क्या सिर्फ ऑनलाइन परीक्षा करा लेने भर से पारदर्शिता आ जाएगी। धांधली की गुंजाइश तब भी बनी रहेगी। इसलिए सबसे जरूरी है कि सिस्टम फुलप्रूफ होना चाहिए और गड़बड़ी होने पर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।”</p> <p>  </p> <p> जेईई जैसी इंजीनियरिंग की परीक्षाएं भी अब ऑनलाइन होने लगी हैं और कई शिफ्टों में आयोजित होती हैं, जबकि नीट अब भी पारंपरिक तरीके से यानी ओएमआर शीट पर पेन से निशान लगाकर होती है। जानकारों का कहना है कि इसकी वजह से इतने सारे प्रश्नपत्रों को एक साथ देश भर के हजारों केंद्रों में पहुंचाना और उन्हें सुरक्षित रखना अपने आप में एक चुनौती है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि पेपर लीक की घटनाएं इन केंद्रों के बजाय दूसरी जगहों से हो रही हैं। जानकारों के मुताबिक परीक्षा केंद्रों पर प्रश्नपत्र कड़े सुरक्षा वाले स्ट्रॉन्गरूम में रखे जाते हैं और परीक्षा से सिर्फ 45 मिनट पहले ही खुलते हैं।</p> <p>  </p> <h3> ऑनलाइन परीक्षा की चुनौतियां</h3> <p> हालांकि विशेषज्ञों की समिति पहले भी कंप्यूटर आधारित परीक्षा की सिफारिश कर चुकी है और अब केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने घोषणा भी कर दी है लेकिन जानकारों का मानना है कि फुल प्रूफ इसे भी नहीं कह सकते और सभी छात्रों के साथ न्याय कर पाना भी मुश्किल होगा।</p> <p>  </p> <p> शिक्षाविद और राइट टू एजूकेशन फोरम के संयोजक अनिल कुमार रॉय कहते हैं कि परीक्षा को ऑफलाइन से ऑनलाइन कर देना कुछ वैसा ही है जैसे चोट सिर में लगी हो तो पट्टी पैर में बांध देना। डीडब्ल्यू से बातचीत में अनिल कुमार रॉय कहते हैं, “⁠⁠ऑनलाइन एग्जाम डिजिटल असमानता को स्थापित करेगा। अधिकांश राज्यों में उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं के छात्र, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में कंप्यूटर-दक्ष नहीं होते हैं। वे परीक्षा के इस मोड में संपन्न परिवारों, निजी विद्यालयों और शहरी छात्रों से कंपीट नहीं कर पाएंगे। दूसरी बात ये कि ऑफलाइन मोड के लीकेज को पकड़ना आसान है, ऑनलाइन के लीकेज को आसानी से पकड़ा नहीं जा सकता है। इसलिए अब धांधली को लेकर शोर भी नहीं होगा।”</p> <p>  </p> <p> अनिल कुमार रॉय कहते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में छात्रों की परीक्षा एक साथ लेने का इंफ्रास्ट्रक्चर भी सरकार के पास नहीं है। इसलिए फिर वह प्राइवेट कंप्यूटर सेंटर को परीक्षा-केंद्र बनाएगी। ये निजी केंद्र सभी सुरक्षा उपायों से न तो लैस होते हैं और न ही यकीन के साथ कहा जा सकता है कि लाखों केंद्र ईमानदार हाथों में हैं।</p> <p>  </p> <p> भले ही इतने छात्रों की परीक्षा एक साथ ना ली जा सके लेकिन परीक्षा कई शिफ्ट में या कई दिनों तक हो सकती है, हालांकि इसमें भी कई चुनौतियां हैं। अनिल कुमार रॉय के मुताबिक, “⁠सारे शिफ्ट के क्वेश्चन सेट एक ही समान कठिन या सरल नहीं होंगे। इससे कठिन सेट वाले बच्चों के कंपीट करने का चांस कम हो जाएगा। यदि इससे बचने के लिए नॉर्मलाइजेशन भी किया जाता है तो अधिक अंक लाने वालों के अंक कम हो जाएंगे और कम अंक लाने वालों के बढ़ जाएंगे।”</p> <h3>  </h3> <h3> धांधली की आशंका ज्यादा</h3> <p> शिक्षाविद अनिल कुमार रॉय कहते हैं, “ऑनलाइन परीक्षा धांधली रोकने की गारंटी नहीं है। कई बार बड़ी ऑनलाइन परीक्षाएं हैक हो चुकी हैं। जेईई मेन्स 2021 में 'रिमोट एक्सेस' जालसाजों ने सुरक्षा प्रणालियों को पूरी तरह से बाईपास कर दिया था। एसएससी सीजीएल 2017 में स्क्रीनशॉट और सिंडिकेट स्कैम हुआ था। सीबीटी मोड में होने वाली इस परीक्षा में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। इसमें परीक्षा हॉल के अंदर से प्रश्नों के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हो गए थे, जबकि हॉल में मोबाइल ले जाना प्रतिबंधित था। सुप्रीम कोर्ट ने इस परीक्षा और सिस्टम को 'दागी' बताया था और परिणामों पर रोक लगा दी थी। जब पिछली परीक्षाओं में अनेक बार ऐसा हो चुका है तो अगली बार न होने की क्या गारंटी है।”</p> <p>  </p> <p> यही नहीं, सीबीटी यानी कंप्यूटर-बेस्ड टेस्ट मोड में और भी कई दिक्कतें हैं। चूंकि सरकारी केंद्रों की कमी के कारण छोटे और निजी 'आईटी केंद्रों' का उपयोग करना पड़ेगा जिसे फुलप्रूफ बनाना आसान नहीं होगा। सर्वर डाउन होने की समस्या अलग होगी। इसके अलावा बायोमेट्रिक सुरक्षा के बावजूद, हाई-टेक डमी कैंडिडेट्स का उपयोग ऐसी परीक्षाओं में आज भी एक चुनौती बनी हुई है। और सबसे बड़ी बात तो ये कि पूरे परीक्षा केंद्र को भी हैक कर लेना भी तकनीकी रूप से संभव है।</p> <p>  </p> <p> ऐसे में इन तमाम सवालों के जवाब ढूंढ़ने के बाद ही ऑनलाइन मोड में परीक्षा कराने का कोई फायदा हो सकता है, अन्यथा मौजूदा सिस्टम को ही सख्त निगरानी और जिम्मेदारी के साथ बेहतर किया जा सकता है।</p>

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