नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। इंदौर सहित देशभर में सड़क हादसों, हार्ट अटैक और स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इन घटनाओं के बाद हर मिनट कीमती हो जाता है। यदि गोल्डन ऑवर में मरीज को अस्पताल पहुंचा दिया जाता है तो उसकी जान बच सकती है, देरी के कारण लोगों की मौत हो जाती है। लेकिन सड़क हादसों में घायलों की गर्दन अधिक हिलाने से भी मौत हो रही है, यह बात एमजीएम मेडिकल कॉलेज के फॉरेंसिक विभाग द्वारा शोध में सामने आई है।
शोध के मुताबिक सड़क हादसे में घायल लोगों की मदद के लिए बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हो जाते हैं। वह घायलों को जल्द अस्पताल पहुंचाने में मदद करते हैं। लेकिन इस बात पर ध्यान रखने की आवश्यकता है कि गर्दन को अधिक ना हिलाएं। इससे घायल की मौत हो सकती है। वर्ष 2025 में सड़क हादसों में 74 लोगों की मौत हुई है। इनमें से 44 लोगों की गर्दन की हड्डी टूटी थी। इनमें से 23 लोग जिंदा अवस्था में इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन बाद में इनकी भी मौत हो गई। इसमें यह कारण भी सामने आया है कि गर्दन को अधिक हिलाने से भी मौत हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक गर्दन की हड्डी सड़क हादसों में टूट जाती है। इसलिए ध्यान रखें कि गर्दन अधिक ना हिलाएं।
हार्ट अटैक और स्ट्रोक में सीपीआर की अहमियत
वहीं हार्ट अटैक के मामलों में शुरुआती कुछ मिनट बेहद अहम होते हैं। समय पर सीपीआर और अस्पताल में इलाज मिलने से मरीज की जान बच सकती है। इसी तरह स्ट्रोक आने पर मरीज को जितनी जल्दी इलाज मिलेगा, दिमाग को उतना कम नुकसान पहुंचेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी बड़ी मेडिकल इमरजेंसी के बाद शुरुआती एक घंटा सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसे गोल्डन आवर कहा जाता है। इस दौरान मरीज को सही इलाज मिल जाए तो उसकी जान बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
शहर में रोजाना बड़ी संख्या में इमरजेंसी के मामले आते हैं। कई मामलों में देरी, गलत तरीके से घायल को उठाना या प्राथमिक उपचार की जानकारी न होना मरीज की हालत और गंभीर बना देता है। आम लोगों को बेसिक फर्स्ट एड और सीपीआर की जानकारी होना जरूरी है, क्योंकि अस्पताल पहुंचने से पहले की मदद ही कई बार जिंदगी बचा सकती है।
भारत की एंबुलेंस में ट्रामा और सर्वाइकल बोर्ड की कमी
दुनिया के कई देशों में सड़क हादसों के मरीजों को सुरक्षित अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस में ट्रामा और सर्वाइकल बोर्ड अनिवार्य रूप से रखे जाते हैं। लेकिन भारत में अब भी अधिकांश एंबुलेंस में यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। गंभीर दुर्घटनाओं में यह उपकरण मरीज की जान बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
ट्रामा बोर्ड एक मजबूत सपाट बोर्ड होता है, जिस पर घायल व्यक्ति को सीधा लिटाकर सुरक्षित तरीके से अस्पताल पहुंचाया जाता है। इससे रीढ़ की हड्डी को नुकसान बढ़ने का खतरा कम होता है। वहीं सर्वाइकल बोर्ड गर्दन को स्थिर रखने के लिए उपयोग किया जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक इसे अनिवार्य करना चाहिए।
सड़क हादसे में घायल की मदद के दौरान यह करें
- सबसे पहले एंबुलेंस और पुलिस को सूचना दें।
- यदि सिर, गर्दन या रीढ़ की चोट लगे तो मरीज को ज्यादा न हिलाएं।
- खून बह रहा हो तो साफ कपड़े से दबाव बनाकर रोकने की कोशिश करें।
- घायल को पानी या खाने की चीज न दें।
- गलत तरीके से उठाने या बाइक पर बैठाकर ले जाने से बचें।
इमरजेंसी गाइड: हार्ट अटैक आने पर यह करें
- तुरंत मरीज को बैठाएं और आराम दें।
- मरीज बेहोश हो जाए और सांस न ले रहा हो तो तुरंत सीपीआर शुरू करें।
विशेषज्ञों की राय: ट्रामा प्रोटोकॉल और आईसीयू हाइजीन का रखें ध्यान
ट्रामा प्रोटोकॉल होता है, उसका पालन करना जरूरी है। इसमें लापरवाही के कारण मरीज की जान भी जा सकती है। इमरजेंसी की स्थिति में एक घंटे के भीतर मरीज को अस्पताल पहुंचाना आवश्यक होता है, इसे गोल्डन आवर कहा जाता है। इसके अलावा आईसीयू में भी प्रवेश करते समय लोगों को हाइजीन का पूरा ध्यान रखना चाहिए। यहां संक्रमण का खतरा रहता है। – डॉ. संजय धानुका, गहन चिकित्सा विशेषज्ञ
सड़क हादसों में घायल को इलाज के लिए एंबुलेंस या कार में बैठाते समय गर्दन का ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि यदि गर्दन अधिक हिल जाती है तो मरीज लकवाग्रस्त हो जाता है या फिर उसकी मौत भी हो सकती है। भारत की एंबुलेंस में ट्रामा और सर्वाइकल बोर्ड अनिवार्य करना चाहिए। कई देशों में इससे लाभ मिल रहा है। – डॉ. निखिलेश जैन, गहन चिकित्सा विशेषज्ञ
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