नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। भारत की अर्थव्यवस्था आज विश्व की सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। आज वैश्विक व्यापार युद्ध, भू-राजनीतिक उथल-पुथल और ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ रहा है। यह चुनौती पूरे विश्व के सामने पश्चिम एशिया के अमेरिका/इजराइल और ईरान देशों के बीच हुए युद्ध से सामने आई।
28 फरवरी 2026 को पश्चिम एशिया में सैन्य संघर्ष शुरू हुआ और चार मार्च को स्ट्रेट आफ होर्मुज बंद हो गया। यह फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच का एक बेहद संकरा और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यह वैश्विक तेल शिपमेंट का लगभग 20 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संभालता है, जिससे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए आधारभूत बन जाता है।
आम नागरिक की भोजन की थाली और जेब पर सीधे असर पड़ रहा है
उसी दिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 120 डालर प्रति बैरल को पार कर गई। भारत अपनी 85-90 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है, यह झटका सीधे हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। वैश्विक युद्ध, पेट्रोल-डीजल और मौसम के कारण महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है। इससे आम नागरिक की भोजन की थाली और जेब पर सीधे असर पड़ रहा है।
यह बात अर्थशास्त्री व अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक अध्ययन संस्थान के प्रो. डा. मनमिंदर सिंह सलूजा ने कही। वे सोमवार को पश्चिम एशिया संकट से डगमगाती हमारी आर्थिकी, क्या है भविष्य, कब उबरेंगे हम? विषय पर नईदुनिया के साप्ताहिक कार्यक्रम विमर्श कार्यक्रम में बोल रहे थे।
प्रो. सलूजा के अनुसार पांच जून 2026 की मौद्रिक नीति पर रिर्जव बैंक आफ इंडिया गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा पिछली नीति में हमने तेल का औसत मूल्य 85 डालर प्रति बैरल माना था, लेकिन पिछले दो महीनों में भारतीय बास्केट का औसत 110 डालर प्रति बैरल रहा है। इसी के आधार पर आरबीआई ने वर्ष 2026-27 के लिए जीडीपी विकास दर का अनुमान 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत किया और महंगाई का अनुमान 4.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत किया। अक्टूबर-दिसंबर 2026 की तिमाही में महंगाई 5.9 प्रतिशत तक जा सकती है। यह आरबीआई की 6 प्रतिशत की सहनशीलता सीमा के निकट है। नीतिगत दरें 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखी गईं और नेचरल रुख बनाए रखा गया।
व्यापार और मुद्रा पर असरअप्रैल 2026 में देश का माल व्यापार घाटा डालर 28.38 अरब रहा। आयात बढ़कर डालर 71.94 अरब और निर्यात डालर 43.56 अरब पर रहे। महंगे तेल का सीधा अर्थ है अधिक डालर खर्च, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है। 18 मई 2026 को रुपया 96.34 प्रति डालर के न्यूनतम स्तर तक पहुंचा। आरबीआई ने विदेशी मुद्रा भंडार के जरिए रुपये को संभाला, जिससे भंडार फरवरी के डालर 728 अरब के शिखर से घटकर मई अंत में डालर 682 अरब पर आया।
ईंधन मूल्य और तेल कंपनियां
उल्लेखनीय है कि सरकार ने तेल की बढ़ती कीमतों के बोझ को संभालने के लिए सक्रिय निर्णय लिए गए। 15 से 25 मई 2026 के बीच केवल 10 दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में चार बार बढ़ोतरी की गई। कुल मिलाकर लगभग 7.5 रुपये प्रति लीटर। हालांकि पेट्रोल पर अभी भी 10.50 रुपये और डीजल पर 35.50 रुपये प्रति लीटर की अंडर रिकवरी बनी हुई है। सरकार अपनी नीतिगत सक्रियता दिखाते हुए पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाकर इन कंपनियों के घाटे को काफी कम कर सकती है और महंगाई को भी नियंत्रित कर सकती है।
पूंजी प्रवाह
आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट (28 मई 2026) के अनुसार वर्ष 2025-26 में शुद्ध एफपीआई निकासी 16.5 डालर अरब रही, जिसमें से 13.1 डालर अरब केवल मार्च में निकले। अच्छा संकेत यह है कि शुद्ध एफडीआई वित्त वर्ष 2024-25 के एक अरब डालर से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 7.7 अरब डालर पर पहुंचा। सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 80.6 अरब डालर से बढ़कर 94.5 अरब डालर रहा, जो की भारत में दीर्घकालिक निवेशकों के विश्वास को दर्शाता है।
अलनीनो की आशंका
अमेरिकी मौसम एजेंसी एनओएए के अनुसार जून-अगस्त 2026 में अलनीनो के उभरने की संभावना 61-70 प्रतिशत है। भारत के मौसम विभाग ने सामान्य से कम मानसून की 31 प्रतिशत संभावना बताई है। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि 2026 की रबी फसल पिछले वर्ष से 3.2 प्रतिशत अधिक है। यह एक महत्वपूर्ण बफर है। फिर भी ऊर्जा महंगाई और संभावित अलनीनो का एकसाथ आना खाद्य मूल्यों पर दबाव बना सकता है।
भविष्य की राह
आरबीआई का पूर्वानुमान बताता है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 की दूसरी छमाही में क्यू-3 में 6.5 प्रतिशत और क्यू-4 में 6.8 प्रतिशत अर्थव्यवस्था फिर रफ्तार पकड़ेगी। अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक कोष (आईएमएफ) अगले वित्त वर्ष 2027-28 में 6.4 प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगाता है। मूडीज ने भी भारत को छह प्रतिशत कि विकास दर के साथ इस वैश्विक उथल-पुथल में लचीली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना है। यह संकट एक सबक भी है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा सौर, पवन और हरित हाइड्रोजन की ओर बढ़ना केवल जलवायु की आवश्यकता नहीं, एक रणनीतिक अनिवार्यता है।
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