इंदौर हाईकोर्ट ने कोरोनाकाल के दौरान धर्म छिपाकर विवाह करने वाले और फिर पत्नी को परेशान करने वाले युवक को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कुटुंब न्यायालय द्वारा पत्नी को कानूनी रूप से विवाहित नहीं मानते हुए उसके भरण-पोषण के आवेदन को निरस्त करने और नाबालिग पुत्री को केवल दो हजार रुपये प्रति माह की राशि स्वीकृत करने पर पत्नी ने हाईकोर्ट की शरण ली थी।
याचिकाकर्ता के वकील राजेश जोशी ने बताया कि युवक ने 23 फरवरी 2020 को खुद को हिंदू बताते हुए मंदिर में महिला की मांग में सिंदूर भरकर विवाह किया था। जून माह में महिला गर्भवती भी हो गई। गर्भावस्था के दौरान सोनोग्राफी जांच के समय आधार कार्ड दिखाए जाने पर पता चला कि युवक हिंदू नहीं है।
महिला ने विरोध किया तो युवक प्रताड़ित करने लगा और धर्म बदलने का दबाव बनाने लगा। जब महिला अपने पिता के यहां रहने आई, तो वहां पहुंचकर उसने महिला और पुत्री के साथ मारपीट की। इसकी रिपोर्ट चार साल पहले द्वारकापुरी थाने में दर्ज की गई थी। बाद में आरोपी महिला पर केस वापस लेने के लिए दबाव बनाने और धमकाने लगा। इसके बाद महिला ने दूसरी बार आरोपी के खिलाफ केस दर्ज कराया।
महिला ने कुटुंब न्यायालय में दावा लगाया तो कोर्ट ने केवल पुत्री को दो हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण राशि देने का आदेश दिया और विवाह को कानूनी रूप से मान्य नहीं मानते हुए महिला की भरण-पोषण याचिका निरस्त कर दी।
इसके बाद पुनरीक्षण याचिका में हाईकोर्ट ने कहा कि धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह करने और उससे संतान उत्पन्न होने की स्थिति में केवल विवाह की वैधता के आधार पर महिला को भरण-पोषण से वंचित करना उसे दोबारा पीड़ित बनाने के समान है। निचली अदालत का आदेश निरस्त करते हुए कोर्ट ने पत्नी को 10 हजार रुपये तथा पुत्री को 10 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण राशि, याचिका दायर करने की तिथि से देने का आदेश दिया।
Source link
#Indore #News #इदर #म #धरम #छपकर #कय #लव #जहद #करट #न #दए #हर #मह #हजर #दन #क #आदश



Post Comment