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आर्कटिक की बर्फ पिघलने से आएगी आफत, मूसलाधार बारिश के बाद चरम पर पहुंच जाएगी ठंड

आर्कटिक की बर्फ पिघलने से आएगी आफत, मूसलाधार बारिश के बाद चरम पर पहुंच जाएगी ठंड

आर्कटिक में तेजी से बर्फ पिघलने की वजह से पूरा मौसम चक्र प्रभावित हो रहा है। वहीं इसका मॉनसून पर ज्यादा असर पड़ सकता है। जानकारों का कहना है कि आर्कटिक में बढ़ती गरमी हर मौसमी गतिविधि को चरम पर पहुंचा देंगी।

मदन जैड़ा।

भारत में आने वाले दशकों में जलवायु खतरा ज्यादा गंभीर रूप धारण कर सकता है। आर्कटिक की बर्फ पिघलने से भारत समेत कई देश में असमय बाढ़-बारिश का खतरा है। मानसून के प्रभावित होने को लेकर सबसे ज्यादा खतरा जताया जा रहा है।

हाल में आर्कटिक को लेकर संसद में पेश रिपोर्ट में कहा गया कि 2040 तक वहां गर्मियों में समुद्र की बर्फ खत्म हो जाएगी। इससे मानसून पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के साथ चरम मौसमी घटनाएं भी बढ़ सकती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्कटिक में गर्मी बढ़ रही है, जिससे 13 फीसदी सालाना की रफ्तार से बर्फ नष्ट हो रही है। बर्फ के पिघलने से कार्बन-मीर्थन उत्सर्जन भी बढ़ रहा, जिससे तापमान में वृद्धि हो रही है।

आर्कटिक की बर्फ और हिमालय तंत्र के बीच ग्रीष्मकालीन मानसून को लेकर गहरा संबंध है। आर्कटिक के कारा सागर में जब समुद्री बर्फ घटती है तो इससे आर्कटिक जल और उष्ण कटिबंधीय जल के बीच तापीय दबाव में कमी आती है। इससे महासागरीय धाराएं प्रभावित होती हैं जो दक्षिण पश्चिम मानसून को प्रभावित कर सकती है।

आर्कटिक उत्तरी गोलार्द्ध के मौसम और जलवायु को प्रभावित करता है। अपेक्षाकृत अत्यधिक ठंडा यह क्षेत्र बाकी हिस्सों की जलवायु को मध्यम करने में मदद करता है। आशंका जताई गई है कि 2040 में जब आर्कटिक की समुद्री बर्फ पिघल जाएगी तो वहां नौवहन में बढ़ोतरी होगी। खनिज एवं गैस का दोहन बढ़ सकता है। इससे आर्कटिक क्षेत्र के तापमान पर और भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

चरम सर्दी की घटनाओं में भी बढ़ोतरी के आसार

आर्कटिक में तापमान की वृद्धि और समुद्री बर्फ में कमी सीधे भारतीय मॉनसून पर प्रतिकूल असर डाल सकती है। इसमें चरम बारिश, अत्यधिक बाढ़ और सूखे की घटनाओं में बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं सर्दियों में चरम पर सर्दी पड़ने की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं।

खनिज-गैस के दोहन से भी तापमान पर असर

आर्कटिक उत्तरी गोलार्द्ध के मौसम और जलवायु को भी प्रभावित करता है। अपैक्षाकृत अत्यधिक ठंडा यह क्षेत्र बाकी हिस्सों की जलवायु को मध्यम करने में मदद करता है। आशंका जताई गई है कि 2040 मेंजब आर्कटिक की समुद्री बर्फ पिघल जाएगी तो नौवहन में बढ़ोतरी होगी। खनिज एवं गैस का दोहन बढ़ सकता है। इसे आर्कटिक क्षेत्र के तापमान पर और भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

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