नई दिल्ली। नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम से जुड़ी एक याचिका की सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई अब अदालत की लिस्टिंग व्यवस्था, रोस्टर और न्यायिक पारदर्शिता को लेकर बहस का विषय बन गई है। 23 सितंबर 2026 को मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाओं पर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने सुनवाई की। सवाल इसलिए उठा क्योंकि 13 जुलाई 2026 से लागू सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर के अनुसार हैबियस कॉर्पस और प्रिवेंटिव डिटेंशन से जुड़े मामले वरिष्ठता क्रम में पहली चार पीठों को आवंटित थे, जबकि यह मामला जस्टिस शर्मा की पीठ के सामने आया।
रोस्टर से अलग बेंच में सुनवाई और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का ऑडियो म्यूट किए जाने को लेकर उठे प्रश्न; मामला नोएडा श्रमिक आंदोलन और आकृति चौधरी की NSA हिरासत से जुड़ा
मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए श्रमिक आंदोलन के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा एवं सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत से जुड़ा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सितंबर की शुरुआत में उनकी हिरासत को रद्द करते हुए संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर टिप्पणियां की थीं और आकृति को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था। यह राशि डीएम मेधा रूपम तथा मामले में जिम्मेदार अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूलने को कहा गया था।
रोस्टर से अलग पीठ में क्यों पहुंचा मामला?
सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग श्रेणी के मामलों की सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश द्वारा रोस्टर निर्धारित किया जाता है। वर्तमान रोस्टर के मुताबिक प्रिवेंटिव डिटेंशन से संबंधित मामले पहली चार पीठों को आवंटित थे। इनमें मुख्य न्यायाधीश की पीठ के अलावा जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एमएम सुंदरेश की अध्यक्षता वाली पीठें शामिल थीं। इसके बावजूद मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाएं जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की पीठ के सामने सूचीबद्ध हुईं।
LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस शर्मा के रोस्टर में “विशेष रूप से आवंटित” अन्य मामलों के लिए जगह है। ऐसी विशेष असाइनमेंट मुख्य न्यायाधीश के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आती है। हालांकि इस मामले को विशेष रूप से उसी पीठ के सामने सूचीबद्ध किए जाने का कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है।
मामले को लेकर सवाल इसलिए भी उठे क्योंकि नोएडा श्रमिक आंदोलन से संबंधित अन्य हिरासत याचिकाएं पहले से जस्टिस बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष लंबित हैं। इनमें कुछ याचिकाएं हिरासत और गिरफ्तारी को चुनौती देने से संबंधित हैं।

सुनवाई के दौरान वीडियो फीड का ऑडियो म्यूट
23 सितंबर को सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की ऑडियो फीड म्यूट कर दी गई। चूंकि सुप्रीम कोर्ट में शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं रहने वाले पत्रकारों के लिए यही वर्चुअल फीड रिपोर्टिंग का माध्यम थी, इसलिए इस कदम पर भी सवाल उठे। The Leaflet के अनुसार, Lawyers Association for Constitution ने मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र में विशेष लिस्टिंग के साथ-साथ सुनवाई के दौरान लाइव फीड म्यूट किए जाने पर आपत्ति जताई।
संस्था ने इसे न्यायिक पारदर्शिता और सार्वजनिक विश्वास के संदर्भ में चिंता का विषय बताया है। हालांकि यह एक वकील संगठन की आपत्ति है, इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा किसी अनियमितता के निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता। मामले की प्रशासनिक लिस्टिंग और सुनवाई के तौर-तरीके पर अंतिम स्थिति संबंधित न्यायिक या प्रशासनिक स्पष्टीकरण से ही स्पष्ट होगी।
हाई कोर्ट ने क्या आदेश दिया था?
मूल विवाद की शुरुआत नोएडा में श्रमिकों के आंदोलन से हुई। आंदोलन के दौरान आकृति चौधरी को हिरासत में लिया गया और बाद में उन पर NSA लगाया गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2 सितंबर को उनकी हिरासत को रद्द कर दिया। विस्तृत आदेश में अदालत ने हिरासत के आधार और उपलब्ध सामग्री पर गंभीर सवाल उठाए तथा इसे कानून की कसौटी पर उचित नहीं माना।
हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया और इसे डीएम मेधा रूपम सहित जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया। साथ ही अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में अदालत की नाराजगी दर्ज करने को भी कहा गया।
यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि अदालत ने केवल हिरासत को रद्द नहीं किया, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही से जुड़ा आर्थिक निर्देश भी दिया था।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
23 सितंबर को जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाओं पर अंतरिम आदेश दिया। प्रारंभिक आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 24 सितंबर को स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया कि रोक इलाहाबाद हाई कोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियों और पांच लाख रुपये की मुआवजा वसूली के निर्देश तक सीमित है।
इसका अर्थ यह है कि हाई कोर्ट की टिप्पणियों और वेतन से मुआवजा वसूलने वाले हिस्से पर फिलहाल रोक है, जबकि मामले की आगे सुनवाई होनी है। रिपोर्ट के अनुसार अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।
मेधा रूपम और मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़ा तथ्य
इस पूरे मामले में एक और तथ्य चर्चा में है। Lawyers Association for Constitution के पत्र और विभिन्न रिपोर्टों में उल्लेख है कि मेधा रूपम भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। यह पारिवारिक संबंध स्वयं किसी न्यायिक निष्कर्ष का आधार नहीं है, लेकिन संगठन ने अपने पत्र में इसी तथ्य का उल्लेख करते हुए मामले की विशेष लिस्टिंग और सुनवाई के तौर-तरीके पर सवाल उठाए हैं।
अब असली सवाल क्या हैं?
पूरे घटनाक्रम में तीन प्रक्रियागत प्रश्न प्रमुख हो गए हैं—पहला, रोस्टर में प्रिवेंटिव डिटेंशन मामलों के लिए निर्धारित पीठों के बजाय यह मामला दूसरी पीठ के सामने क्यों सूचीबद्ध हुआ; दूसरा, यदि यह विशेष रूप से आवंटित मामला था तो उसके प्रशासनिक आधार क्या थे; और तीसरा, खुली सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की ऑडियो फीड म्यूट करने का कारण क्या था।
इन सवालों पर फिलहाल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री में कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अंतरिम राहत देते हुए हाई कोर्ट की टिप्पणियों और मुआवजा संबंधी निर्देश पर रोक लगाई है और आगे सुनवाई का रास्ता खुला रखा है।
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