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Indore के छत्रीबाग में 27 दिन तक ठहरी थीं देवी अहिल्याबाई होलकर, एक छोटे से गांव को बनाया था समृद्ध इंदौर

Indore के छत्रीबाग में 27 दिन तक ठहरी थीं देवी अहिल्याबाई होलकर, एक छोटे से गांव को बनाया था समृद्ध इंदौर

रामनाथ मुटकुले, नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। प्रात:स्मरणीय देवी अहिल्याबाई होलकर केवल इंदौर और महेश्वर ही नहीं, अपितु मालवा-निमाड़ के साथ ही पूरे देश में पूजी जाती हैं। उनकी प्रजा वात्सल्यता, न्याय प्रियता और धर्म प्रियता का आदर्श आज 300 वर्ष बाद भी कायम है। देवी अहिल्याबाई भारत के इतिहास की प्रमुख और महान नारियों में से एक हैं।

इंदौर के लिए यह और अधिक गौरवान्वित होने की बात इसलिए है कि यह उनकी कर्मभूमि रही है। अपने जीवन का सर्वाधिक काल उन्होंने इंदौर के समीप महेश्वर में व्यतीत किया और यहीं से राजकीय सूत्रों का संचालन कर इतिहास में अपना नाम अमर कर गईं। करीब 30 साल के शासनकाल के दौरान राजमाता अहिल्याबाई होलकर ने एक छोटे से गांव इंदौर को एक समृद्ध एवं विकसित शहर बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

तपती दोपहर में तम्बुओं में रहने का निर्णय

देवी अहिल्याबाई होलकर 26 मई 1784, बुधवार को इंदौर आई थीं, तब यहां भीषण गर्मी का दौर चल रहा था। यहां उन्होंने होलकर राजघराने के सदस्यों की छत्रियों के मध्य छतरीबाग में ठहरने का निर्णय लिया। हालांकि यहां के कमाविसदार खंडो बाबूराव ने अहिल्याबाई की खातिरदारी की भारी व्यवस्था की थी।

इसके बावजूद तपती दोपहर में वहां अस्थायी बने डेरे-तम्बुओं में देवी ने रहना तय किया। उन्होंने अपना तम्बू सास स्व. गौतमाबाई होलकर तथा अपने पुत्र मालेराव की छतरियों के मध्य लगवाया। वे इंदौर में कुल 27 दिन 21 जून 1784 तक रहीं। पुत्र की छतरी देखकर वे भावविह्ल हो उठीं और देर तक पुत्र की छतरी को निहारती रहीं।

देवगुराड़िया शिव मंदिर में पूजा और सराफा में डकैती

इंदौर प्रवास के दौरान वे देवगुराड़िया शिव मंदिर गईं और पूजा-अर्चला की। अहिल्याबाई ने अपने ससुर स्व. मल्हारराव होलकर और अपने पति स्व. खण्डेराव की स्मृति में दो मूर्तियां स्थापित करवाईं, जो आज भी छतरीबाग में स्थापित हैं।

14 जून को वे जूनी इंदौर स्थित इंदौर के जमींदार (मंडलोई) के घर पहुंचीं, जहां जमींदार ने स्वागत-सत्कार किया और नजराने के रूप में भेंट दी। उनके इस इंदौर प्रवास के दौरान ही 12 जून 1784 को सराफा क्षेत्र में बड़ी डकैती की वारदात हुई। यहां के बड़े व्यापारी की डकैतों ने हत्या कर दी और लूटपाट कर भाग गए।

छतरीबाग का निर्माण और ऐतिहासिक सनदें

कान्ह और चन्द्रभागा नदियों के तट पर ऊंचे टीले पर जूनी इंदौर बसा है, जो परमारकालीन बस्ती है। इन्हीं नदियों के समीप 1754 में होलकर राजपरिवार के सदस्यों की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए छतरीबाग का निर्माण हुआ।

संयोग ही है कि उसी वर्ष इंदौर राज्य के संस्थापक सूबेदार मल्हारराव होलकर के एकमात्र पुत्र व अहिल्याबाई के पति खण्डेराव का कुम्भेर के दुर्ग को फतह करते समय प्राणांत हो गया। जूनी इंदौर का गणपति मंदिर भी काफी महत्वपूर्ण था। इस मंदिर से संबंधित कुछ सनदें हैं, जो अहिल्याबाई के शासनकाल की हैं।

धार्मिक सद्भाव और खजराना के फकीर को जमीन

मंगलवार, जनवरी 25, 1790 ई. को इंदौर के तत्कालीन कमाविसदार खण्डो बाबूराव को एक पत्र द्वारा हिदायत दी गई थी कि वह इस मंदिर में भादौ माह की शुक्ल पक्ष चतुर्थी के दिन मनाए जाने वाले उत्सव के लिए 40 रु. की सहायता व 25 ब्राह्मणों के भोज के लिए आवश्यक सामग्री प्रदान करता रहे। दूसरा पत्र 27 जून 1797 को लिखा गया है जिसमें इंदौर नगर में निवास करने वाली विभिन्न जातियों के मुखियाओं को अहिल्याबाई ने निर्देश दिया था कि वे इस मंदिर की पूजा आदि के लिए प्रतिमाह सामग्री देते रहें।

इस पत्र से यह रोचक तथ्य सामने आया है कि इंदौरवासी मुस्लिम पिंजारे लोग भी इस मंदिर को सहायता देते थे। इंदौर के समीप ‘खजराना’ ग्राम में तख्शन फकीर निवास करते थे। वे नाहर सैयद पीर के पुजारी थे। उनके प्रति सम्मान प्रकट करते हुए इंदौर नगर के कमाविसदार के माध्यम से 1780 ई. में 15 बीघे जमीन की सनद अहिल्याबाई ने प्रदान की थी।

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रपट का निर्माण और सुरक्षा व्यवस्था पर कड़ा पत्र

जूनी इंदौर के खेड़ापति मंदिर तक आने-जाने के लिए श्रद्धालु नावों में बैठकर नदी पार करते थे। इस कठिनाई को दूर करने के लिए जूनी इंदौर और नई बस्ती को जोड़ने वाली एक रपट नदी पर बनाई गई। देहावसान के चार वर्ष पूर्व भी वे इंदौर आईं थीं। उनकी उपस्थिति में इंदौर नगर में चोरी व डकैती हुईं।

उनके दल में महेश्वर से जो लोग इंदौर आए थे, उनमें 5 व्यक्तियों के वहां चोरियां हुईं। महेश्वर पहुंचकर उन्होंने इंदौर नगर की सुरक्षा व पुलिस व्यवस्था के संबंध में एक कड़ा पत्र तत्कालीन कमाविसदार खण्डो बाबूराव को लिखा था।

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