राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय प्रदेश के 26 जिलों से ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी, सावां, कंगनी और चीना का जर्मप्लाज्म जुटाएगा।
HighLights
- 26 जिलों से ज्वार, बाजरा समेत सात श्रीअन्न जुटेंगे
- राज्य सरकार ने परियोजना के लिए 25 लाख रुपये दिए
- कम पानी में उपज और टिकाव की क्षमता परखेंगे
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय प्रदेश के 26 जिलों से श्रीअन्न की प्रमुख फसलों ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी, सावां, कंगनी और चीना का जर्मप्लाज्म एकत्र करेगा। वैज्ञानिक इनका परीक्षण कर ऐसे गुणों की पहचान करेंगे, जिनके आधार पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल नई और बेहतर किस्में विकसित की जा सकें। कुछ जिलों से जर्मप्लाज्म का संग्रह पहले ही किया जा चुका है।
25 लाख रुपये का मिला अनुदान
राज्य सरकार ने परियोजना के लिए विश्वविद्यालय को 25 लाख रुपये का अनुदान दिया है। इस राशि से जर्मप्लाज्म के संग्रहण, संरक्षण, परीक्षण और अनुसंधान से जुड़ी गतिविधियां संचालित की जाएंगी। साथ ही अलग-अलग जिलों में मिट्टी, वर्षा, खेती की परिस्थितियों और स्थानीय स्तर पर प्रचलित किस्मों का अध्ययन होगा।
झाबुआ-आलीराजपुर पर विशेष फोकस
जर्मप्लाज्म संग्रहण में झाबुआ और आलीराजपुर को प्राथमिकता दी जा रही है। आदिवासी बहुल इन जिलों में कम वर्षा और सीमित सिंचाई के बावजूद किसान पथरीली व कम उपजाऊ जमीन पर लंबे समय से ज्वार, बाजरा, कोदो और कुटकी की खेती करते हैं। यहां के देशी बीजों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की क्षमता विकसित हुई है। वैज्ञानिक इन्हीं गुणों को चिह्नित करेंगे।
कम पानी में उत्पादन की क्षमता परखेंगे
अनुसंधान में कम जल उपलब्धता में उपज, स्थानीय जलवायु के अनुरूप अनुकूलन, प्रतिकूल परिस्थितियों में टिकाव और उत्पादकता जैसे गुणों का मूल्यांकन किया जाएगा। बेहतर विशेषताओं वाली प्रजातियों को आगे के प्रजनन कार्यक्रम में शामिल कर नई वैरायटी विकसित करने का प्रयास होगा।
पारंपरिक बीज बनेंगे शोध का आधार
25 लाख रुपये की सहायता से प्रदेश के विभिन्न कृषि क्षेत्रों में उपलब्ध श्रीअन्न की विविधता को सुरक्षित रखने के साथ चयनित नमूनों का परीक्षण और शोध किया जाएगा। इससे किसानों द्वारा वर्षों से संरक्षित पारंपरिक बीज आधुनिक कृषि अनुसंधान के लिए उपयोगी आनुवंशिक संसाधन बन सकेंगे।
इनका कहना है
26 जिलों से स्थानीय श्रीअन्न के जर्मप्लाज्म जुटाए जाएंगे। इनके विज्ञानी परीक्षण के माध्यम से उपयोगी कृषि गुणों की पहचान होगी। इन्हीं विशेषताओं को आधार बनाकर बेहतर किस्म विकसित करने की दिशा में अनुसंधान किया जाएगा।
– डॉ. आरके कौशिक, निदेशक अनुसंधान, राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय
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