नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। मरीजों का इलाज करने वाले डॉक्टर अब खुद मानसिक तनाव और अवसाद जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। मेडिकल शिक्षा का बढ़ता दबाव, लगातार प्रतिस्पर्धा, परिवार से दूरी और निजी रिश्तों में तनाव अब मेडिकल विद्यार्थियों और युवा डॉक्टरों की मानसिक सेहत पर गहरा असर डाल रहा है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि इंदौर और ग्वालियर स्थित टेलीमानस सेल में हर माह 50 से अधिक फोन नीट विद्यार्थियों और डॉक्टरों के आ रहे हैं।
इनमें ज्यादातर छात्र पढ़ाई के तनाव, चिंता, अवसाद, रिश्तों की समस्याओं और अकेलेपन से परेशान हैं। एमजीएम मेडिकल कालेज में संचालित स्टूडेंट वेलनेस क्लीनिक के आंकड़े बताते हैं कि हर महीने 10 से 15 एमबीबीएस और पीजी विद्यार्थी मानसिक समस्याओं के समाधान के लिए यहां पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह संख्या केवल उन विद्यार्थियों की है जो मदद लेने आगे आते हैं, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है।
मनोचिकित्सक डॉ. वर्चस्वी मुद्गल ने बताया कि मानसिक समस्याओं को लेकर अभी जागरूकता की आवश्यकता है, लोग मानते ही नहीं हैं कि वह समस्या से जूझ रहे हैं। डॉक्टरों में भी तनाव बढ़ रहा है। आत्महत्या के विचार अचानक नहीं आते। यह लंबे समय तक चलने वाली मानसिक प्रक्रिया का परिणाम होते हैं। इसलिए परिवार, मित्रों को शुरुआती संकेतों को पहचानना चाहिए।
एमजीएम के डॉक्टर ने की आत्महत्या
हाल ही में एमजीएम मेडिकल कॉलेज के पीजी विद्यार्थी डॉ. अमन पटेल निवासी जबलपुर ने होस्टल की छत से कूदकर आत्महत्या की है। इस घटना के बाद मेडिकल कालेज प्रशासन ने मानसिक स्वास्थ्य सहायता की गतिविधियां बढ़ा दी हैं। कालेज में पिछले दो-तीन वर्षों से स्टूडेंट वेलनेस क्लीनिक संचालित किया जा रहा है, जहां मनोचिकित्सक विद्यार्थियों की काउंसलिंग करते हैं। होस्टल, कैंटीन और वार्डों के आसपास हेल्पलाइन नंबर भी लगाए गए हैं ताकि जरूरत पड़ने पर छात्र तुरंत सहायता ले सकें।
मेडिकल फील्ड में पढ़ाई का दबाव सामान्य कोर्स से अधिक
विशेषज्ञों के अनुसार मेडिकल फील्ड में पढ़ाई का दबाव सामान्य कोर्स की तुलना में कहीं अधिक होता है। विद्यार्थियों को लंबे समय तक पढ़ाई करनी पड़ती है। लगातार परीक्षा और प्रैक्टिकल का तनाव रहता है। कई छात्र छोटे शहरों और गांवों से बड़े शहरों में पढ़ने आते हैं, जहां उन्हें परिवार का भावनात्मक सहारा नहीं मिल पाता। ऐसे में अकेलेपन की भावना बढ़ने लगती है।
कई मामलों में रिलेशनशिप तनाव, भविष्य को लेकर चिंता और उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर पाने का डर भी मानसिक परेशानी को बढ़ा देता है। इसके अलावा अत्यधिक मोबाइल उपयोग और इंटरनेट मीडिया की तुलना की संस्कृति भी युवाओं को मानसिक रूप से कमजोर बना रही है। देर रात तक जागना, अनियमित दिनचर्या और पर्याप्त आराम न मिलना भी मानसिक संतुलन को प्रभावित करता है।
मेंटरशिप प्रोग्राम से मदद की कोशिश
प्रबंधन ने बताया कि मेडिकल कॉलेज में नए विद्यार्थियों के लिए मेंटरशिप प्रोग्राम चलाया जा रहा है। इसमें वरिष्ठ डॉक्टर और शिक्षक विद्यार्थियों के गार्जियन की तरह उनका मार्गदर्शन करते हैं। छात्र अपनी व्यक्तिगत समस्याएं भी उनसे साझा कर सकते हैं। यदि समय रहते विद्यार्थियों की परेशानी समझ ली जाए तो गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है।
इन संकेतों को नजरअंदाज न करें
- विद्यार्थी अचानक चुप रहने लगें
- पढ़ाई या काम में प्रदर्शन गिरने लगें
- नशे की लत में शामिल होने लगें
- बार-बार निराशा की बातें करें
- सोशल मीडिया पर उदासी या आत्महत्या से जुड़े पोस्ट डालें
- अपनी पसंदीदा चीजें दूसरों को बांटने लगें
यह भी पढ़ें : इंदौर में चोरों की तरह लोगों के मोबाइल झपट रही पुलिस, ताकि अगली बार ना करें लापरवाही
Source link
#डकटर #म #बढ #रह #तनव.. #एमप #म #हर #महन #स #जयद #नट #सटडट #डकटर #ल #रह #कउसलग



Post Comment