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दुनिया बड़े फार्म देखती रही, ब्रिक्स के कृषि मंत्रियों की बैठक में भारत ने दिखा दी छोटे किसान की ताकत

दुनिया बड़े फार्म देखती रही, ब्रिक्स के कृषि मंत्रियों की बैठक में भारत ने दिखा दी छोटे किसान की ताकत

अरविंद दुबे, नईदुनिया, इंदौर। दुनिया की कृषि नीति लंबे समय तक उत्पादन, निर्यात और बड़े कृषि फार्मों के इर्द-गिर्द घूमती रही। अधिक पैदावार, अधिक मशीनीकरण और बड़े पैमाने पर खेती को कृषि विकास का मानक माना गया। जबकि इंदौर में हुई ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की घोषणा एक अलग कहानी कहती है। यह दस्तावेज बताता है कि भविष्य की खेती का सबसे महत्वपूर्ण पात्र बड़ा कृषि उद्यम नहीं, बल्कि छोटा किसान होगा।

इंदौर घोषणा से एक बात स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है कि इसमें छोटे और पारिवारिक किसानों का उल्लेख बार-बार किया गया है। खाद्य सुरक्षा से लेकर जलवायु परिवर्तन, कृषि व्यापार, तकनीक, बीज, वित्त और ग्रामीण विकास तक लगभग हर विषय को छोटे किसानों के नजरिए से देखने का प्रयास किया गया है।

खाद्य सुरक्षा की असली नींव हैं छोटे किसान

यह बदलाव संयोग नहीं है। ब्रिक्स देशों में दुनिया की बड़ी आबादी रहती है और करोड़ों किसान आज भी छोटे जोत क्षेत्र पर खेती करते हैं। भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अन्य सदस्य देशों के अनुभव बताते हैं कि खाद्य सुरक्षा की असली नींव छोटे किसानों के हाथों में ही है। ऐसे में यदि जलवायु परिवर्तन, बाजार अस्थिरता या उत्पादन संकट का असर सबसे पहले किसी पर पड़ता है तो वह यही वर्ग है।

भारत के लिए यह दृष्टिकोण और भी महत्वपूर्ण है। देश के अधिकांश किसान छोटे और सीमांत वर्ग में आते हैं। उनकी औसत जोत छोटी है, संसाधन सीमित हैं और जोखिम उठाने की क्षमता कम है। बावजूद देश की खाद्य सुरक्षा का बड़ा भार उन्हीं के कंधों पर है। यही कारण है कि इंदौर घोषणा में तकनीक, वित्त, बीमा, बाजार और नवाचार को बड़े कृषि कारोबार की बजाय छोटे किसानों तक पहुंचाने पर जोर दिखाई देता है।

भारतीय कृषि सोच की दिखी स्पष्ट छाप

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने प्राकृतिक खेती, किसान उत्पादक संगठनों, डिजिटल कृषि, महिला किसानों की भागीदारी और स्थानीय फसलों को बढ़ावा देने जैसी पहलों पर जोर दिया है। इन विषयों की स्पष्ट छाप इंदौर घोषणा में भी दिखाई देती है।

दस्तावेज का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें किसानों को केवल उत्पादक नहीं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान, जैव विविधता और बीज विरासत के संरक्षक के रूप में भी स्वीकार किया गया है। यानी कृषि को केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के रूप में देखने की कोशिश की गई है।

समिति संसाधनों में भी दुनिया को दे रहे अन्न

इंदौर घोषणा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भविष्य की कृषि नीति का मूल्यांकन केवल उत्पादन के आधार पर नहीं होगा। यह भी देखा जाएगा कि खेती कितनी टिकाऊ है, किसानों की आय कितनी सुरक्षित है और छोटे किसान नई तकनीक तथा बाजार तक कितनी पहुंच बना पा रहे हैं।

इसी मायने में इंदौर घोषणा केवल कृषि सहयोग का दस्तावेज नहीं, बल्कि वैश्विक कृषि सोच में बदलाव का संकेत है। यह बताती है कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा केवल बड़े खेतों और भारी निवेश से नहीं, बल्कि उन करोड़ों छोटे किसानों से तय होगी जो सीमित संसाधनों के बावजूद दुनिया की थाली भर रहे हैं। भारत ने इसी सोच को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की कोशिश की है।

चुनौतियां भी सबसे ज्यादा इन्हीं के सामने

भारत की कृषि व्यवस्था की रीढ़ छोटे और सीमांत किसान हैं, लेकिन चुनौतियां भी सबसे ज्यादा इन्हीं के सामने हैं। डिजिटल तकनीक, एफपीओ और सटीक खेती उनके लिए केवल विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरत बनते जा रहे हैं। – डॉ. सतीश परसाई, पूर्व कृषि विज्ञानी, भोपाल

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