सोमवार-मंगलवार की आधी रात से प्रदेशभर की कृषि उपज मंडियों में आधा प्रतिशत बढ़ा हुआ मंडी शुल्क लागू कर दिया। प्रदेशभर के व्यापारी और किसान इस तरह से की …और पढ़ें
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। सोमवार-मंगलवार की आधी रात से प्रदेशभर की कृषि उपज मंडियों में आधा प्रतिशत बढ़ा हुआ मंडी शुल्क लागू कर दिया। प्रदेशभर के व्यापारी और किसान इस तरह से की गई बढ़ोतरी से अब नाराज दिख रहे हैं। बीती कैबिनेट की बैठक में मंडी शुल्क वृद्धि का निर्णय हुआ था। इसके बाद व्यापारी मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचे थे। शुल्क वृद्धि के लाभ और हानि पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने व्यापारियों से विस्तार से रिपोर्ट मांगी थी।
जारी चर्चा के बीच ही अधिकारियों ने रातों-रात शुल्क वृद्धि लागू कर दी। इस पर विरोध के स्वर बुलंद हो गए हैं। समस्त अनाज-दलहन व कृषि उपज पर पहले 100 रुपये मूल्य पर 1 रुपये मंडी शुल्क लागू था। इसे अब 1.50 रुपये कर दिया है। इंदौर अनाज-तिलहन व्यापारी संघ मंडी शुल्क में इस वृद्धि के विरोध में एसोसिएशन की साधारण सभा बुलाने की तैयारी कर रहा है। इस बीच अनाज-तिलहन व्यापारी महासंघ बैठक के बाद प्रदेश के अन्य मंडी कारोबारियों को जोड़कर विरोध में प्रदेश स्तर का आंदोलन खड़ा करने जा रहा है।
अधिकारी तलाश रहे अपना लाभ
एमपी अनाज-तिलहन व्यापारी संघ के अध्यक्ष गोपालदास अग्रवाल के अनुसार प्रदेश में पहले से मंडी शुल्क की दर अन्य प्रदेशों से ज्यादा थी। शुल्क वृद्धि का निर्णय हुआ तो 11 जून को ही व्यापारियों का प्रतिनिधि मंडल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मिलने पहुंचा था। व्यापारियों ने उन्हें बताया था कि शुल्क से जितना राजस्व जमा नहीं होगा, उससे ज्यादा किसान व उपभोक्ताओं का नुकसान होगा। इस पर मुख्यमंत्री ने व्यापारियों से विस्तार से रिपोर्ट मांगी थी।
18 जून को सीएम फिर इंदौर आ रहे हैं। सांसद शंकर लालवानी के जरिए हमने विस्तार से रिपोर्ट देने के लिए सीएम से समय मांगा था। हालांकि रातोंरात बढ़ा शुल्क लागू करने का आदेश जारी कर दिया। इससे पूरा नुकसान किसानों और उपभोक्ताओं का होगा। व्यापारी तो बढ़े शुल्क को किसानों या उपभोक्ताओं से ही वसूलेगा।
दरअसल शुल्क शासन के खाते में नहीं जाना है, ना इससे सड़क या कोई ढांचा बनना है। यह तो मंडी के कर्मचारी-अधिकारियों के वेतन-भत्तों पर खर्च होना है। साफ है कि कर्मचारी-अधिकारी अपना भविष्य व पेंशन सुरक्षित करने के चलते बढ़ा शुल्क लागू कर रहे हैं।
छह साल से मंडी समिति नहीं
व्यापारी विरोध आंदोलन खड़ा करने की तैयारी में हैं। दरअसल मंडी समिति के प्रदेशभर में छह साल से शासन ने चुनाव भी नहीं करवाए हैं। पहले मंडी समिति का अध्यक्ष किसान होता था और निर्णय किसान प्रतिनिधियों की सहमति से होते थे। समिति नहीं बनाकर भारसाधक के रूप में अधिकारी को बैठा दिया है। ऐसे में मनमाने निर्णय हो रहे हैं और किसानों का नुकसान हो रहा है। जबकि मंडी शुल्क कोई टैक्स नहीं है, बल्कि सिर्फ मंडी की व्यवस्था के बदले लिया जाने वाला शुल्क है। 20 पैसे निराश्रित शुल्क भी अलग से लिया जा रहा है, जो कलेक्टर के खाते में जा रहा है। उसका कोई उपयोग मंडी में नहीं हो रहा।
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