नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने 9 वर्षीय बच्ची को पिता के साथ कनाडा वापस भेजने से इंकार करते हुए उसकी कस्टडी मां को सौंप दी। कोर्ट ने कहा कि मां ही बच्चे का पहला आश्रय और सुरक्षा है। कोर्ट ने फैसले में भारतीय सभ्यता, रामायण और महाभारत के सिद्धांतों का भी उल्लेख भी किया।
न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति बिनोद कुमार द्विवेदी की युगलपीठ बच्ची के पिता की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें कनाडा की कोर्ट के आदेश के आधार पर बच्ची की कस्टडी पिता को सौंपने और उसे इंदौर से कनाडा भेजने की मांग की गई थी।
कोर्ट ने फैसले में कहा कि मां बच्चे का पहला घर, पहली शिक्षिका और पहली संरक्षक होती है। यह केवल आधुनिक कानूनी अवधारणा नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का मूल मूल्य है।
रामायण और महाभारत में भी मातृत्व की इसी भूमिका को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। कोर्ट ने रामायण का उल्लेख करते हुए कहा कि जब माता सीता, भगवान राम से अलग हुईं, तब उनके पुत्र लव और कुश का पालन-पोषण महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में केवल सीता ने किया।
यद्यपि राम अयोध्या के राजा और बच्चों के पिता थे, फिर भी बच्चों का पालन मां के सान्निध्य में हुआ। इससे स्पष्ट है कि बच्चों के भावनात्मक, नैतिक और मानसिक विकास में मां की भूमिका सर्वोपरि है।
मां का स्नेह और भावनात्मक जुड़ाव किसी भी अन्य रिश्ते से बढ़कर है। जिस तरह से लव-कुछ का पालन पोषण माता सीता के संरक्षण में हुआ, उसी तरह एक बच्ची के विकास के लिए मां की छत्रछाया अनिवार्य है। कोर्ट ने फैसले में संस्कृत श्लोक “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” का उल्लेख भी किया।
विदेशी कोर्ट के आदेश को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता
- कोर्ट ने कहा कि विदेशी कोर्ट के आदेशों का सम्मान किया जाता है, लेकिन उन्हें यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। बच्चे की भलाई और हित सर्वोपरि हैं।
- अगर विदेशी आदेश बच्चे के हित के विपरीत है तो भारत की कोर्ट उसे लागू करने के लिए बाध्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि बच्ची चार वर्ष से भारत में अपनी मां के साथ रह रही है।
- यहां अच्छे स्कूल में पढ़ रही है। वह यहां के वर्तमान वातावरण में पूरी तरह से रची-बसी है और मां के प्रति उसका गहरा भावनात्मक लगाव है।
- ऐसे में केवल विदेशी कोर्ट के आदेश के आधार पर बच्ची की कस्टडी पिता को नहीं सौंपी जा सकती।
- बच्ची का कल्याण मां के साथ भारत में रहने में है। बच्ची को मां के पास से हटाकर कनाडा भेजना उसके मानसिक विकास के लिए घातक होगा।
यह था पूरा मामला
विवाह के बाद सौरभ मालपानी पत्नी दिव्या के साथ अमेरिका और कनाड़ा में बस गए थे। विदेश में ही बच्ची का जन्म हुआ। वर्ष 2022 में दिव्या बेटी को लेकर भारत आ गई और फिर लौटी नहीं। मार्च 2024 में कनाडा की कोर्ट पिता के पक्ष में फैसला सुनाया था। इस फैसले के आधार पर पिता ने हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत की थी।
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