मस्जिद पक्ष के वकीलों ने तर्क रखते हुए कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य रिकार्ड पर उपलब्ध नहीं है जिससे साबित हो कि मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को तोड़ा गया था। स …और पढ़ें
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। धार स्थित भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने के लिए मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में चल रही याचिकाओं में बुधवार को भी सुनवाई जारी रही। मस्जिद पक्ष के वकीलों ने तर्क रखते हुए कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य रिकार्ड पर उपलब्ध नहीं है जिससे साबित हो कि मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को तोड़ा गया था। सौ वर्ष से अधिक समय तक धार पर मुस्लिम शासकों का शासन रहा। इस दौरान उन्होंने कई इमारतों का निर्माण कराया, जिसमें पुरानी इमारतों के मलबा का उपयोग हुआ। निर्माण स्थानीय कारीगरों द्वारा किया गया था और यह बात मस्जिद में नजर आ भी रही है।
राजस्व रिकॉर्ड और 700 साल की परंपरा का हवाला
मस्जिद में 700 वर्ष से अधिक समय से नमाज पढ़ी जा रही है। राजस्व रिकार्ड में भी धार के सर्वे नंबर 313 पर मस्जिद ही है। मस्जिद पक्ष ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप भी लगाया। कहा कि भोजशाला को लेकर चल रही याचिकाओं में एएसआइ अलग-अलग जवाब दे रहा है। मस्जिद में अगर संस्कृत में लिखे श्लोक मिले हैं तो अरबी में लिखी बातें भी मिली हैं। कोर्ट का समय समाप्त होने से मस्जिद पक्ष के तर्क अधूरे रहे। सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी। कोर्ट ने एएसआइ के वकील से कहा है कि मस्जिद पक्ष के तर्क सुनने के बाद वे अपने तर्क रखें।
एएसआइ की कार्यप्रणाली पर उठाए गए सवाल
बुधवार दोपहर ठीक 2.30 बजे भोजशाला मामले में सुनवाई शुरू हुई। मस्जिद पक्ष की ओर से तर्क रखते हुए एडवोकेट एनए शेख ने पुराने राजस्व रिकार्ड का हवाला देते हुए कहा कि पुराने खसरों के अवलोकन से यह बात स्पष्ट है कि सर्वे नंबर 313 राजस्व रिकार्ड में मस्जिद और सर्वे नंबर 312 मस्जिद वाला के नाम से दर्ज था। ऋण पुस्तिका से भी यह बात स्पष्ट हो रही है। एडवोकेट वारसी ने मस्जिद पक्ष की ओर से तर्क रखते हुए कहा कि हमने याचिका में परिसर में पूजा पर रोक लगाने और धार्मिक सद्भाव बनाए रखने की मांग की है। भोजशाला को लेकर चल रही याचिकाओं में हमने एएसआइ के विरुद्ध कोई राहत नहीं मांगी है, बावजूद इसके एएसआइ दोहरा मापदंड अपना रहा है।
लंदन की मूर्ति और तोड़फोड़ के साक्ष्यों पर बहस
भोजशाला को लेकर चल रही अलग-अलग याचिकाओं में एएसआइ अलग-अलग जवाब दे रहा है। हिंदू फ्रंट फार जस्टिस और अन्य याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मस्जिद बनाने के लिए मंदिर में तोड़फोड़ की गई थी, लेकिन रिकार्ड में ऐसा कोई साक्ष्य ही नहीं है जो सिद्ध करे कि ऐसी कोई तोड़फोड़ हुई थी। यही स्थिति लंदन के संग्रहालय में रखी मूर्ति को लेकर भी है। याचिकाकर्ता इसे सरस्वती देवी की मूर्ति बता रहे हैं, लेकिन ब्रिटिश कमिश्नर खुद पत्र लिखकर कह चुके हैं कि यह मूर्ति सरस्वती देवी की नहीं बल्कि अंबिका की है।
मलबे से निर्माण का तर्क और याचिका निरस्त करने की मांग
पूरा परिसर मंदिर नहीं बन जाता एडवोकेट वारसी ने तर्क रखा कि अस्पताल या पुलिस थाने में मंदिर बना देने से पूरा अस्पताल या पुलिस थाना मंदिर परिसर नहीं बन जाता। उन्होंने कहा कि मुस्लिम शासकों के कार्यकाल में पुरानी इमारतों के मलबे से कई नए निर्माण हुए। यही वजह है कि इतिहास में भोजशाला में तोड़फोड़ का कोई रिकार्ड नहीं है। मंदिर पक्ष मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की अपनी बात सिद्ध करने में असफल रहा है इसलिए उनकी याचिका निरस्त की जाए। एएसआइ आज रख सकती है अपना पक्ष मस्जिद पक्ष की ओर से गुरुवार को भी तर्क रखे जाएंगे। कोर्ट ने एएसआइ के वकील से कहा है कि मस्जिद पक्ष के बाद तर्क रखने के लिए तैयार रहें। एएसआइ गुरुवार को अपना पक्ष कोर्ट के सामने रख सकती है।
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