इंदौर सिर्फ मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी नहीं, आस्था और इतिहास से भरा शहर भी है। …और पढ़ें
HighLights
- कृष्णाबाई होलकर ने गोपाल मंदिर बनवाया, छत मजबूती परखने हाथी चलवाकर देखे गए थे
- मल्हारराव ने हरकू बाई के लिए बांके बिहारी मंदिर बनवाया, दुर्गा मंदिर जगह हाथी ने तय की
- शिवाजीराव ने बिजासन में पुत्र कामना की आराधना की, देवगुराड़िया गरूड़ तीर्थ अहिल्याबाई ने संवारा
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। इंदौर केवल मध्य प्रदेश आर्थिक राजधानी ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक संपन्नता की खूबी वाला शहर भी है। यहां बेशक ज्योतिर्लिंग, शक्तिपीठ, पवित्र नदी या हजारों वर्ष पुराने मंदिर नहीं लेकिन आस्था का दीप यहां सदैव प्रज्वलित रहता है। शहर की खूबी को बढ़ाते ऐतिहासिक स्थल भी हैं और ऐतिहासिक महत्व लिए हुए मंदिर भी हैं।
इतिहासकार शर्वाणी के अनुसार यहां के हर मंदिर की अपनी मान्यता, कहानी और विशेषता है। यूं तो शहर में हजारों मंदिर हैं पर कुछ मंदिर बहुत प्रसिद्ध हैं और इन्हीं में से एक है गोपाल मंदिर। राजबाड़ा क्षेत्र का गोपाल मंदिर का निर्माण कृष्णाबाई होलकर ने कराया था। इस मंदिर के निर्माण की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसकी छत की मजबूती का परीक्षण करने के लिए इस पर हाथी चलवाकर देखे गए थे।
बांके बिहार का मंदिर भी है प्रसिद्ध
इसी मंदिर के पास एक और कृष्ण मंदिर है जिसका निर्माण इससे भी पहले हुआ था। यह मंदिर है बांके बिहारी का। मल्हारराव होलकर ने अपनी चौथी पत्नी हरकू बाई के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया था। हरकू बाई श्रीकृष्ण की भक्त थीं।
राजबाड़ा के समीप ही बने प्राचीन दुर्गा माता मंदिर में देवी मूर्ति स्थापना को लेकर किवदंती है कि देवी ने राजा को स्वप्न में दर्शन देकर कहा था कि हाथी पर मूर्ति सवार कर शहर में घुमाई जाए और जहां हाथी रुके वहीं मंदिर का निर्माण हो। हाथी जिस कोतवाली के सामने रुका उसे ही मंदिर में तब्दील कर दिया गया।
बिजासन माता मंदिर में की थी एक महीने तक आराधना
बात अगर देवी मंदिर की करें तो शहर का बिजासन मंदिर भी बहुत प्राचीन है। कहा जाता है कि शिवाजीराव होलकर ने यहां एक माह रुककर पुत्र कामना के लिए देवी की आराधना की थी और उसके बाद तुकोजीराव तृतीय का जन्म हुआ था। यह मंदिर तंत्र साधना का भी केंद्र रहा। एक वक्त था जब यहां बहुतायत में कृष्णमृग पाए जाते थे।
देवगुराड़िया है गरूड़ देव की तपोस्थली
कृष्णपुरा पुल पर बना दत्त मंदिर कब से है इसका कोई प्रमाण नहीं। किवदंती है कि शिवाजी महाराज के गुरु स्वामी राम समर्थ कुछ वक्त वहां रुके भी थे और उन्होंने शहर में खेड़ापति हनुमान मंदिर का निर्माण भी कराया था। देवगुराड़िया मंदिर को गरूड़ तीर्थ के रूप में भी जाना जाता है।
मान्यता अनुसार यहां गरूड़ देव ने तपस्या की थी। इस मंदिर का जीर्णोद्धार अहिल्याबाई होलकर ने कराया था। यहां स्थापित शिवलिंग पर जब गोमुख से जलधारा गिरने लगती थी तब यह माना जाता था कि शहर की कान्ह नदी में पर्याप्त पानी आ गया है।
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