नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। इंदौर में NEET पेपर लीक के विरोध में आंदोलन कर रहे छात्र नेताओं को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने नेशनल एजुकेटेड यूथ यूनियन (एनईवाययू) के छात्र नेताओं राधेश्याम जाट और सुरेंद्र यादव को जमानत देने का आदेश दिया। अदालत ने पुलिस द्वारा लगाई गई उस शर्त को भी निरस्त कर दिया, जिसमें जमानतदार का सरकारी कर्मचारी होना अनिवार्य किया गया था।
कोर्ट ने शर्त को बताया अव्यावहारिक
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जमानत के लिए ऐसी कठिन और बोझिल शर्तें नहीं लगाई जा सकतीं, जिन्हें पूरा करना व्यावहारिक रूप से संभव ही न हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी हिरासत में लिए गए व्यक्ति की रिहाई के लिए सरकारी कर्मचारी को जमानतदार बनाना अनिवार्य करना, वास्तव में जमानत से इनकार करने के समान है। अदालत ने कहा कि जमानत प्रक्रिया का उद्देश्य राहत देना है, न कि ऐसी शर्तें लगाना जिनसे रिहाई असंभव हो जाए।
22 जुलाई को हिरासत में लिए गए थे दोनों छात्र नेता
अभिभाषक जयेश गुरनानी के अनुसार, भंवरकुआं क्षेत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे एनईवाययू के राधेश्याम जाट और सुरेंद्र यादव को 22 जुलाई को पुलिस ने हिरासत में लिया था। दोनों छात्र नेता नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्रों के प्रदर्शन के समर्थन में 23 जुलाई को शांतिपूर्ण जुलूस निकालने की तैयारी कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने पुलिस से अनुमति भी मांगी थी, लेकिन पुलिस ने एक रात पहले ही उन्हें हिरासत में ले लिया।
सरकार और याचिकाकर्ताओं की दलील
दोनों छात्र नेताओं की ओर से हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि दोनों को संज्ञेय अपराध की आशंका के आधार पर हिरासत में लिया गया था। सरकार ने यह भी कहा कि पुलिस उन्हें रिहा करने को तैयार थी, लेकिन वे एसीपी जोन-4 द्वारा निर्धारित जमानत की शर्तों का पालन नहीं कर रहे थे।
अदालत के समक्ष पेश आदेश में जमानत के लिए एक लाख रुपये की प्रतिभूति, एक लाख रुपये का बंधपत्र तथा सरकारी कर्मचारी को जमानतदार बनाने की शर्त रखी गई थी। शर्त पूरी नहीं होने पर दोनों को जेल भेज दिया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि सरकारी कर्मचारी अपनी नौकरी पर प्रभाव पड़ने की आशंका के कारण ऐसी जमानत देने से बचते हैं। इसलिए यह शर्त व्यवहारिक रूप से उनकी रिहाई को असंभव बना देती है।
सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का किया उल्लेख
सरकार ने अदालत में कहा कि वर्ष 2024 से दोनों के आचरण को देखते हुए ये शर्तें लगाई गई थीं। सरकार का कहना था कि वर्ष 2024 में दोनों ने हिंसक प्रदर्शन के जरिए शांति भंग करने का प्रयास किया था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि जमानत देते समय अत्यधिक कठोर शर्तें लगाना सामान्य न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हो सकता। अदालत ने माना कि सरकारी कर्मचारी को जमानतदार बनाने की शर्त व्यावहारिक नहीं है और यह जमानत से इनकार के समान प्रभाव पैदा करती है।
50-50 हजार रुपये के निजी मुचलके पर मिली राहत
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिका बंदी प्रत्यक्षीकरण के रूप में दायर की गई थी, लेकिन हिरासत और जमानत की कठोर शर्तों को देखते हुए याचिकाकर्ताओं को अन्य वैधानिक उपाय अपनाने के लिए भेजना उचित नहीं होगा। अदालत ने दोनों छात्र नेताओं को 50-50 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक-एक सक्षम जमानतदार की संतुष्टि पर जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।
Source link
#एमप #हईकरट #क #बड #फसल #छतर #नतओ #क #द #जमनत #जमनत #क #लए #सरकर #करमचर #क #शरत #मनमन #करर



Post Comment